Religion / Culture

चैती छठ पूजा 2026: नहाय-खाय से पारण तक की सम्पूर्ण विधि, शुभ मुहूर्त और अचूक नियम

एकांत में पूजा: सूर्य देव और छठी मैया की पूजा के बाद व्रती एकांत कमरे में यह प्रसाद ग्रहण करते हैं।…

नदी के घाट पर सूर्य देव को अर्घ्य देती हुई व्रती महिलाएं, चैती छठ पूजा का मनोरम

मार्च का महीना आते ही जैसे हवाओं में एक अलग सी गर्माहट और पवित्रता घुलने लगती है। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश की माटी से जुड़े हर इंसान के कानों में एक ही धुन गूंजने लगती है— छठी मैया के सुरीले गीत। आप और हम कार्तिक मास की दीपावली के बाद वाली छठ पूजा से तो भली-भांति वाकिफ हैं, लेकिन वसंत ऋतु के जाते और ग्रीष्म ऋतु के आते ही जो छठ मनाई जाती है, उसे चैती छठ कहते हैं। तपती धूप की शुरुआत और पूरे 36 घंटे का कठिन निर्जला उपवास... यह सिर्फ एक त्योहार नहीं है। यह प्रकृति, जल और जीवन के मुख्य स्रोत 'सूर्य देव' के प्रति हमारी अटूट आस्था का सबसे जीवंत प्रमाण है।

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर अपनी जड़ों से कटने लगते हैं। लेकिन छठ एक ऐसा महापर्व है जो हमें वापस हमारी मिट्टी, हमारी नदियों और हमारे संस्कारों से जोड़ता है। मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि इस बार 2026 में चैती छठ की शुरुआत कब से हो रही है, खरना किस दिन है और अर्घ्य का शुभ समय क्या रहेगा। अगर आप पहली बार यह व्रत उठा रहे हैं या अपने परिवार के साथ इस महापर्व में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं, तो यह जानकारी आपके बहुत काम आने वाली है।

आखिर क्या है चैती छठ और यह कार्तिक छठ से अलग कैसे है?

हिंदू धर्म में सूर्य देव की उपासना के लिए छठ का पर्व साल में दो बार आता है। पहला, चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष में जिसे 'चैती छठ' कहते हैं और दूसरा कार्तिक महीने में जिसे 'कार्तिक छठ' कहा जाता है। दोनों ही पर्वों की पूजा विधि, नियम और निष्ठा बिल्कुल एक समान होती है।

चैती छठ आमतौर पर चैत्र नवरात्रि के दिनों के आस-पास ही पड़ती है। मौसम में हो रहे बदलाव के कारण इस समय शरीर को नई ऊर्जा और रोग प्रतिरोधक क्षमता की जरूरत होती है। सूर्य की उपासना और सात्विक आहार का यह चार दिवसीय अनुष्ठान हमारे शरीर और मन, दोनों को मौसम के इस बदलाव के लिए तैयार करता है। गर्मी के दस्तक देते ही नदियों के किनारे खड़े होकर सूर्य की पहली किरण को नमन करना अपने आप में एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव है।

चैती छठ पूजा 2026 की महत्वपूर्ण तिथियां और शुभ मुहूर्त

साल 2026 में चैती छठ का पावन पर्व 22 मार्च से शुरू होकर 25 मार्च तक पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। आप अपनी तैयारियों को समय पर पूरा कर सकें, इसके लिए तिथियों का सटीक विवरण कुछ इस प्रकार है:

  • नहाय-खाय (पहला दिन): 22 मार्च 2026, रविवार
  • खरना या लोहंडा (दूसरा दिन): 23 मार्च 2026, सोमवार
  • संध्या अर्घ्य (तीसरा दिन): 24 मार्च 2026, मंगलवार
  • उषा अर्घ्य और पारण (चौथा दिन): 25 मार्च 2026, बुधवार
 छठ पूजा के लिए गेहूं धोती और घर को शुद्ध करती हुई एक महिला का दृश्य

चार दिनों के महापर्व की विस्तृत पूजा विधि

छठ पूजा कोई साधारण व्रत नहीं है, इसे व्रतों में सबसे कठिन 'महाव्रत' का दर्जा हासिल है। यह लगातार चार दिनों तक चलने वाली एक कठिन साधना है। आइए इन चारों दिनों के नियमों और विधियों को गहराई से समझते हैं।

पहला दिन: नहाय-खाय (22 मार्च 2026)

इस महापर्व की शुरुआत 'नहाय-खाय' की परंपरा से होती है। रविवार, 22 मार्च को व्रती महिलाएं और पुरुष किसी पवित्र नदी, तालाब या घर में गंगाजल मिलाकर स्नान करते हैं।

  • शुद्धिकरण: घर के चप्पे-चप्पे की सफाई की जाती है। लहसुन, प्याज या किसी भी तामसिक वस्तु का घर में प्रवेश पूरी तरह वर्जित हो जाता है।
  • कद्दू-भात का प्रसाद: स्नान के बाद व्रती अपने हाथों से मिट्टी के चूल्हे पर या पूरी शुद्धता के साथ कद्दू (लौकी) की सब्जी, चने की दाल और अरवा चावल का भात बनाते हैं।
  • महत्व: इसमें सेंधा नमक का ही इस्तेमाल होता है। यह सात्विक भोजन शरीर की अशुद्धियों को दूर कर उसे आने वाले कठिन निर्जला व्रत के लिए अंदर से मजबूत बनाता है।

दूसरा दिन: खरना या लोहंडा (23 मार्च 2026)

सोमवार, 23 मार्च को खरना मनाया जाएगा। खरना का सीधा सा अर्थ है 'शुद्धिकरण'। यह दिन मन और शरीर पर संयम रखने का दिन है।

  • दिनभर का उपवास: इस दिन व्रती पूरे दिन अन्न और जल का त्याग कर उपवास रखते हैं।
  • रसियाव का निर्माण: शाम ढलने पर आम की लकड़ी और मिट्टी के चूल्हे पर गुड़, दूध और चावल से एक खास खीर बनाई जाती है जिसे 'रसियाव' कहते हैं। इसके साथ ही बिना नमक की रोटियां भी सेंकी जाती हैं।
  • एकांत में पूजा: सूर्य देव और छठी मैया की पूजा के बाद व्रती एकांत कमरे में यह प्रसाद ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि अगर प्रसाद खाते समय कोई आवाज हो जाए, तो व्रती वहीं खाना छोड़ देते हैं। इसी प्रसाद को खाने के बाद व्रतियों का 36 घंटे का अखंड निर्जला उपवास शुरू हो जाता है।
खरना के दिन मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ की खीर और प्रसाद बनाती हुई व्रती महिला

तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य (24 मार्च 2026)

मंगलवार, 24 मार्च का दिन चैती छठ का सबसे प्रमुख और भावुक कर देने वाला दिन होता है। यह दिन डूबते हुए सूर्य (अस्ताचलगामी सूर्य) की वंदना का है, जो हमें सिखाता है कि जो डूबता है, उसका भी सम्मान होना चाहिए।

  • दउरा और सूप की सजावट: दोपहर से ही घरों में प्रसाद बनाने की रौनक शुरू हो जाती है। बांस की नई टोकरियों (दउरा) और सूप में ठेकुआ, चावल के लड्डू, गन्ना, डाभ (नारियल), केला, सेब और अन्य मौसमी फल सजाए जाते हैं।
  • घाट की ओर प्रस्थान: शाम होते ही पूरा परिवार नंगे पांव दउरा सिर पर उठाकर नदी या तालाब के घाट की ओर गाते-बजाते निकलता है।
  • डूबते सूर्य को अर्घ्य: घाट पर पहुंचकर व्रती कमर तक पानी में खड़े हो जाते हैं। सूप को हाथों में लेकर, दूध और जल से डूबते हुए सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। इस दौरान पूरा माहौल छठी मैया के गीतों से गुंजायमान रहता है।

चौथा दिन: उषा अर्घ्य और पारण (25 मार्च 2026)

बुधवार, 25 मार्च को इस महाव्रत का अंतिम चरण पूरा होगा। इसे 'पारण का दिन' भी कहते हैं।

  • उगते सूर्य का इंतजार: इस दिन व्रती रात के अंधेरे में ही घाट पर पहुंच जाते हैं और पानी में खड़े होकर पूर्व दिशा की ओर टकटकी लगाए सूर्य की पहली लालिमा का इंतजार करते हैं।
  • उषा अर्घ्य: जैसे ही क्षितिज पर सूर्य की पहली किरण फूटती है, ठीक उसी विधि से उगते सूर्य (उदीयमान सूर्य) को अर्घ्य दिया जाता है।
  • व्रत का समापन: सूर्य देव और छठी मैया से परिवार की सुख, शांति और निरोगी काया की प्रार्थना करने के बाद व्रती कच्चे दूध और प्रसाद का सेवन करके अपना 36 घंटे का निर्जला उपवास खोलते हैं। इसके बाद घाट पर ही मौजूद सभी श्रद्धालुओं में प्रसाद का वितरण होता है।
उषा अर्घ्य के समय उगते हुए सूर्य को जल और दूध से अर्घ्य देती हुई महिलाएं

चैती छठ का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व

छठ पूजा सिर्फ परंपरा का निर्वाह नहीं है, इसके पीछे एक बहुत ही गहरा और ठोस विज्ञान छिपा है। चैत्र का महीना वह समय होता है जब सर्दियां विदा ले रही होती हैं और गर्मियां शुरू हो रही होती हैं। मौसम के इस संधिकाल में हमारे शरीर को कई तरह के संक्रमणों का खतरा होता है।

लगातार उपवास करने से हमारे शरीर का प्राकृतिक 'डिटॉक्सिफिकेशन' (Detoxification) होता है। शरीर के भीतर जमा सभी विषाक्त तत्व बाहर निकल जाते हैं। इसके अलावा, सुबह और शाम के समय कमर तक ठंडे पानी में खड़े होकर सूर्य की किरणों को शरीर पर पड़ने देना 'विटामिन डी' (Vitamin D) का सबसे बेहतरीन और प्राकृतिक स्रोत है। पानी के परावर्तन (Reflection) के जरिए सूर्य की किरणें सीधे हमारी आंखों और त्वचा पर पड़ती हैं, जो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को चमत्कारी रूप से बढ़ाती हैं।

छठ पूजा में ध्यान रखने योग्य सख्त नियम

छठ पर्व में जितनी श्रद्धा होती है, नियम उतने ही सख्त होते हैं। थोड़ी सी भी चूक इस व्रत में स्वीकार्य नहीं होती है। अगर आप व्रत कर रहे हैं, तो इन नियमों का पालन हर हाल में सुनिश्चित करें:

  • बांस के बर्तनों का ही प्रयोग: पूजा के दौरान प्लास्टिक, स्टील या लोहे के बर्तनों का इस्तेमाल वर्जित है। फल और प्रसाद रखने के लिए हमेशा बांस से बने सूप और दउरा का ही इस्तेमाल करना चाहिए। बांस को अत्यंत पवित्र और प्रकृति का प्रतीक माना जाता है।
  • साफ-सफाई का सर्वोच्च स्तर: प्रसाद बनाते समय हाथ-पैर बिल्कुल साफ होने चाहिए। जिस चूल्हे पर प्रसाद बन रहा हो, उस पर रोजाना का खाना नहीं बनना चाहिए। इसके लिए हर साल नया मिट्टी का चूल्हा बनाना उत्तम माना जाता है।
  • बिस्तर का त्याग: नहाय-खाय के दिन से लेकर व्रत के पारण तक, व्रती को मुलायम गद्दे या पलंग पर नहीं सोना चाहिए। फर्श पर कंबल, चटाई या साफ चादर बिछाकर सोना ही इस व्रत का कठोर नियम है।
  • तामसिक भोजन से दूरी: इस दौरान पूरे परिवार को भी प्याज, लहसुन, अंडा, मांस या मदिरा से मीलों दूर रहना चाहिए। घर का माहौल पूरी तरह से भक्तिमय और सात्विक होना चाहिए।

चैती छठ का विशेष प्रसाद: ठेकुआ और मौसमी फल

छठ का नाम सुनते ही सबसे पहले जिस चीज की महक दिमाग में आती है, वह है 'ठेकुआ'। इसके बिना छठ पूजा की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

ठेकुआ को गेहूं के आटे, शुद्ध देसी घी और गुड़ या चीनी से बनाया जाता है। इसे सांचों पर रखकर खास डिजाइन दिया जाता है और फिर घी में डीप फ्राई किया जाता है। चूंकि गेहूं नई फसल होती है और गुड़ शरीर को ऊर्जा देता है, इसलिए इसे प्रसाद के रूप में सर्वोत्तम माना गया है। इसके अलावा अर्घ्य के सूप में गन्ना, पानी वाला नारियल (डाभ), हरा केला, गागर (बड़ा नींबू) और पानी सिंघाड़ा जरूर शामिल किया जाता है। ये सभी चीजें सीधे तौर पर प्रकृति और किसानों के खेतों से जुड़ी होती हैं, जो इस त्योहार को प्रकृति प्रेम का सबसे बड़ा उत्सव बनाती हैं।

Comments (0)

Leave a Comment

Email will not be published.